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Archive for September 11th, 2011

२२.तीर्थंकर श्री अरिष्टनेमी जी – जीवन परिचय

11 Sep

भगवान श्री अरिष्टनेमी अवसर्पिणी काल के बाईसवें तीर्थंकर हुए | इनसें पुर्व के इक्कीस तीर्थंकरों को प्रागैतिहासिककालीन महापुरुष माना जाता है | आधुनिक युग के अनेक इतिहास विज्ञों ने प्रभु अरिष्टनेमि को एक एतिहासिक महापुरुष के रुप में स्वीकार किया है |

वासुदेव श्री क्रष्ण एवं तीर्थंकर अरिष्टनेमि न केवल समकालीन युगपुरूष थे बल्कि पैत्रक परम्परा से भाई भी थे | भारत की प्रधान ब्राह्मण और श्रमण -संस्क्रतियों नें इन दोनों युगपुरूषों को अपना -अपना आराध्य देव माना है | ब्राह्मण संस्क्रति ने वासुदेव श्री क्रष्ण को सोलहों कलाओं से सम्पन्न विष्णु का अवतार स्वीकारा है तो श्रमण संस्क्रति ने भगवान अरिष्टनेमि को अध्यात्म के सर्वोच्च नेता तीर्थंकर तथा वासुदेव श्री क्रष्णा को महान कर्मयोगी एवं भविष्य का तीर्थंकर मानकर दोनों महापुरुषों की आराधना की है |

भगवान अरिष्टनेमि का जन्म यदुकुल के ज्येष्ठ पुरूष दशार्ह -अग्रज समुद्रविजय की रानी शिवा देवी की रत्नकुक्षी से श्रावण शुक्ल पंचमी के दिन हुआ | समुद्रविजय शौर्यपुर के राजा थे | जरासंध से चलते विवाद के कारण समुद्रविजय यादव परिवार सहित सौराष्ट्र प्रदेश में समुद्र तट के निकट द्वारिका नामक नगरी बसाकर रहने लगे | श्रीक्रष्ण के नेत्रत्व में द्वारिका को राजधानी बनाकर यादवों ने महान उत्कर्ष किया |

आखिर एक वर्ष तक वर्षीदान देकर अरिष्टनेमि श्रावण शुक्ल षष्टी को प्रव्रजित हुए | चउव्वन दिनों के पश्चात आश्विन क्रष्ण अमावस्य को प्रभु केवली बने | देवों के साथ इन्द्रों और मानवों के साथ श्री क्रष्ण ने मिलकर कैवल्य महोत्सव मनाया | प्रभु ने धर्मोपदेश दिया | सहस्त्रों लोगों ने श्रमणधर्म और सहस्त्रों ने श्रावक -धर्म अंगीकार किया |

वरदत्त आदि ग्यारह गणधर भगवान के प्रधान शिष्य हुए | प्रभु के धर्म-परिवार में अठारह हजार श्रमण , चालीस हजार श्रमणीयां , एक लाख उनहत्तर हजार श्रावक एवं तीन लाख छ्त्तीस हजार श्राविकाएं थीं | आषाढ शुक्ल अष्ट्मी को शत्रुंजय पर्वत से प्रभु ने निर्वाण प्राप्त किया |

भगवान के चिन्ह का महत्व

शंख – भगवान अरि्ष्टनेमि के चरणों में अंकित चिन्ह शंख है | शंख में अनेक विशेषताएं होती है | ‘ संखे इव निरंजणे ‘ शंख पर अन्य कोई रंग नहीं चढता | शंख सदा श्वेत ही रहता है | इसी प्रकार वीतराग प्रभु शंख की भांति राग-द्वेष से निर्लेप रहते व्हैं | शंख की आक्रति मांगलिक होती है और शंख की ध्वनि भी मंगलिक होती है | कहा जाता है कि शंख -ध्वनि से ही उँ की ध्वनि उत्पन्न होती है | शुभ कर्यों जैसे – जन्म , विवाह , ग्रह -प्रवेश एवं देव-स्तुति के समय शंख -नाद की परम्परा है | शंख हमें मधुर एवं ओजस्वी वाणी बोलने की शिक्षा देता है |

 
 

श्री शांतिनाथ भगवान् की स्तुति (श्लोक ३३ – ३६)

11 Sep

श्री शांतिनाथ भगवान् की स्तुति (श्लोक ३३ – ३६)

तव थुति से ही ऊष्मा उर्जा, पल पल मुझको बल मिलता
तव थुति संबल लेकर चिन्मय , अविचल जिनपथ पर चलता
ऊष्मा पाकर बर्फ समा नित, कर्म कालिमा है गलता
तुम दर्शन से शांति जिनेश्वर, मुरझाया मम मन खिलता !!३३!!

भावार्थ :-जड़कर्मो के संयोग की वजह से मैं चिन्मय होकर भी चेतना से रहित जडवत हो गया हूँ , मुझ में अनंत शक्ति विद्यमान होते हुए भी मैं शक्तिहीन बन गया हूँ , किन्तु हे जिनेन्द्र भगवन ! आपकी स्तुति एवं भक्ति से मुझे ऊष्मा मिलती हैं , उर्जा मिलती है , चेतनता इतनी जग जाती हैं , आपकी स्तुति से ही पथ पर आगे भाधने के लिए मुझे पल – पल बल मिलता हैं, आपकी स्तुति रूपी संबल लेकर शक्तिहीन होते हुए भी आपके मार्ग पर विचलित नहीं होते हुए आप जैसे अविरल चलने लगता हूँ !
आपकी स्तुति से ही मेरी आत्मा के एक -एक प्रदेश में उष्मा एवं उर्जा का संचार होता हैं , जिस प्रकार सूर्य की उस ऊष्मा और उर्जा को पाकर बर्फ का वह पर्वत पिघल जाता हैं, उसी प्रकार मेरी आत्मा की उस ऊष्मा और उर्जा को पाकर कर्म रूपी बर्फ का वह पर्वत भी गल जाता है , पिघल जाता हैं! हे शांति जिनेश्वर ! भाव विभोर होकर जब मैं आपकी शांत, वितरागमय ,निराकुल मुद्रा का दर्शन करता हूँ, तब थका हारा मुरझाया हुआ मेरा मन रूपी उपवन दर्शनमात्र से ही कमल के समान खिल उठता हैं!

रण आँगन में सेना भी वह, रण मेरी जब सुनती है
शत्रु वर्ग से लड़ने को तब, बाहु फड़कने लगती हैं
हे जिन! जब मैं जिनवानीमय , रण भेरी को सुनता हूँ
बाहु फड़कने लगती हैं तब, विधि से लड़ने लगता हूँ !!३४!!

भावार्थ :-युद्ध के लिए रण आँगन में खड़ी वह सेना जब रणभेरी को सुनती हैं, तब सुनते ही शत्रु वर्ग से लड़ने के लिए सेना की बाहु जिस प्रकार फड़कने लगती हैं ! उसी प्रकार कर्म रूपी शत्रुओं से लड़ने के लिए हमेशा – हमेशा के लिए सावधान होकर रणागन में खड़ा साधक योधा मैं जिनवानी रूपी रणभेरी को जब सुनता हूँ , तब करम रूपी बलवान शत्रु से लड़ने के लिए मेरी बाहू फड़कने लगती हैं , और मैं निर्भीक निडर , निरीह होकर द्रढ़ता के साथ अविरल रूप से कर्मो से लड़ने लगता हूँ, अर्थात आपकी वाणी सुनकर मुझे कारणों से लड़ते हुए मोक्ष मार्ग पर बढ़ने की प्रेरणा मिलती हैं!

रोग स्वयं के भूल जगत जन, पर को रोगी कहते हैं
रोग देखकर रोगी जन को, दूर हमेशा करते हैं
रोगी जन अरु हे जिन! तुमको, दूर कोई क्या कर सकता
जन्म जरा भव रोग मरण क्या, तुम बिन कोई हर सकता !!३५!!

भावार्थ :-संसार का प्रत्यक प्राणी जनम, जरा, मृत्यु , रूपी महाभयानक रोग से ग्रसित हैं, अनादिकाल से आज तक इस भव रोग से एक समय के लिए भी मुक्त नहीं हो पाया हूँ स्वयं के इस महाभयानक भव रोग को भूल कर दुसरो के रोगों को देखने वाला छिद्रान्वेषी स्वयं की गलती को भूल दुसरे की गलती को देखता हैं , अपने आपको स्वस्थ एवं समझदार समझता हैं, और किसी के शारीर में कुछ समय के लिए कोई रोग हो जाता हैं तो उसे रोगी कहकर उससे ग्लानी करने लगता हैं, अपने बीच से उसको दूर करने लगता हैं. किन्तु भव रोग की ही शांति करने वाले हे शांति जिनेश्वर ! वे रोगों को तो अपने से दूर कर सकते हैं , पर उनके ह्रदय में विराजमान आपको भी कोई क्या दूर कर सकता हैं? और अपने से आपको दूर कर क्या कोई स्वयं के जनम , जरा , मृत्यु रूपी भव रोग को हर सकता हैं? अत: मैं आपकी स्तुति कर रहा हूँ, क्यूंकि मुझे तन का रोग नहीं , चेतन का रोग दूर करना हैं ! चेतन का यह भव रोग ही दूर हो जायेगा , तो तन का रोग कैसे रह पायेगा? अपने आप ही समाप्त हो जायेगा !

माँ से शिशु को मात्र द्रव्य से, मनुष्य अलग तो कर सकता
पर क्या कोई शांति जिनेश्वर, माँ की ममता हर सकता
इस विध तुमसे जग जन मुझको, दूर द्रव्य से कर सकते
पर क्या कोई मम हर्दय से, हे जिन! तुमको हर सकते !!३६!!

भावार्थ :-ममता से भरी माँ से शिशु को मनुष्य मात्र द्रव्य से तो अलग कर सकता हैं , किन्तु इन दोनों को दूर करके भी क्या कोई मनुष्य माँ की ममता को भी हर सकता हैं ? अर्थात माँ की ममता को ही हरने को क्षमता इस दुनिया में क्या किसी के पास हैं? इसी प्रकार हे शांति जिनेश्वर! संसार के सब लोग मिलकर भी आपसे और आप के इस मार्ग से मुझको द्रव्य से तो दूर कर सकते हैं , पर मेरे ह्रदय में , मेरे रग-रग में विराजमान आपको भी क्या कोई छीन सकता हैं ? अर्थात हे शांतिनाथ भगवन ! साक्षात् आप ही क्यूँ न हो , साक्षात् मेरे गुरु भी क्यूँ न हों, इतना ही नहीं, इस संसार की कोई भी शक्ति ,कोई भी व्यक्ति, मुझको मेरे भीतर के मोक्षमार्ग से एवं आपके अनुराग से एक क्षण के लिए भी विचलित अर्थात अलग नहीं कर सकता हैं!

 
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Posted in Jainism, Puja