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Posts Tagged ‘जैन पूजा’

श्री नाकोडा भैरव प्रार्थना

13 May

आवोजी आवो भैरवनाथ, ओ नाकोडा वाले |
तुम हो डूंगरीया वाले, तुम हो घूँघरीया वाले ||

मस्तक मुकुट सोहे, कानो मैं कुंडल सोहे |
गले मोतियन को हार, ओह नाकोडा वाले || 1 ||

हाथे खड्गधारी, डमरू की शोभा न्यारी |
चोसठ योगिनी साथ, ओ नाकोडा वाले || 2 ||

अष्ट बुझ को धारी, शत्रु को दो सम्हारी |
मेरे तो तुम्ही एक नाथ, ओ नाकोडा वाले || 3 ||

तीर्थ नाकोडा सोहे, भव्य जीवो को मोहे |
दीपे भैरव मनोहर, ओ नाकोडा वाले || 4 ||

आवोजी आवो, भैरव दरस दिखाओ |
दुःखडा मिटाओ मेरा, नाथ ओ नाकोडा वाले || 5 ||

ध्यान तुम्हारा धरु, काज हमारो सारो |
श्री संघ के सर पर तेरा हाथ, ओ नाकोडा वाले || 6 ||

चिंता जी चुरो ने आशा जी पूरो,
नव निधि करो मेरे नाथ,ओ नाकोडा वाले || 7 ||

नाकोडा तीर्थ की महिमा भारी, लीला भैरव की न्यारी |
सेवक अरज करत है चरणों की सेवा प्यारीलगे ओ नाकोडा
वाले आवोजी आवो भैरव नाथ, ओ नाकोडा वाले || 8 |

 

श्री पारस इक्तिसा

11 May

पारस प्रभु के चरणों मैं, निशदिन करू प्रणाम |
मन वंचित पुरो प्रभु, श्याम वर्ण सुखधाम || १ ||

चरण-शरण मैं भक्त तुम्हारा, शरणागत हु मैं दुखियारा |
भव- सागर से हमें उबारो, अपने यश की बात विचारो || २ ||

तुम जन जन के बने सहारे, हम तो सारे जग से हारे|
हारा तुमको हार चढ़ावे, तो जग मैं कैसे यश पावे || 3 ||

जीवन के हर बंधन खोलो, मत मेरे पापो को तोलो |
पूजा की कुछ रीत न जाने, आये मन की पीर सुनाने || ४ ||

तुमने अनगनित पापी तारे, मैं भी आया द्वार तुम्हारे |
मुझको केवल आस तुम्हारी, अपना लो है भाव- भयहारी || ५ ||

सकल धरा को स्वर्ग बनाया, व्यंतर को संकित दरसाया |
लेकर नर-अवतार धरा पर, पाप मिटाया ज्ञान जगाकर || ६ ||

पोष वादी दशमी तिथि पाकर, नभ से उतरी किरण धरा पर |
धर्मपुरी काशी मैं जन्मे, शंकर रमे, जहा कण कण मैं || ७ ||

बडभागी वह वामा माता, जिसने जन्मा तुमसा जाता |
अश्वसेन के पूत कहाये, फिर भी जगतपिता पद पाये || ८ ||

कमठ तपस्वी अति अभिमानी, प्रभु तुम सकल तत्व के ज्ञानी |
आग जली संग जली तपस्या, धर्म बन गया स्वयं समस्या || ९ ||

काष्ट चिराय, नाग दिखाया, आंसू से अभिषेक कराया |
महामंत्र नवकार सुनाकर, स्वर्ग दिलाया पुण्य जगाकर ||

धन्य धन्य वे प्राणी जलचर, मंत्र सुनाते जिन्हें जिनेश्वर |
महामंत्र की महिमा भारी, पारस प्रभु वर्तो जयकारी ||

राज महल के राग- रंग मैं, रहकर भी थे नहीं संग मैं |
नेमिनाथ की करुना जानी, जग की समझी पीर पुराणी ||

राग मिटा वैराग जगाया, मुक्तिपंथ पर चरण बढ़ाया |
भले- बुरे का भाव न रखते, प्रभुवर तो समता मैं रमते ||

लगे बरसने ओले सीर पर, वर्षा होती रही निरंतर |
आंधी ने गिरी शिखर गिराये, पारस प्रभु को कौन डिगाए ||

सुरनर नरपति मुनिजन देवा, करते प्रभु चरणों की सेवा|
प्रभु अनंता, प्रभु कथा अनंता कह न सके सुर नरवर सन्ता ||

पद्मावती सेविका माता, जिसकी महिमा त्रिभुवन गाता |
जिसमे प्रभु को सीर पर धारा, रहा भूमंडल सारा ||

माँ की मूरत मंगलकारी, पुरे मनोकामना सारी |
चरण कमल मैं शीश नमाऊ, अपनी बिगड़ी बात बनाऊ ||

फणधर ने फन- छत्र बनाया, श्री धर्नेंद्र देव हर्षाया |
है चिंतामणि ! चिंता चुरो, विघ्न हरो हर इच्छा पुरो ||

शंकर जैसे हर कंकर मैं, पारस वैसे हर पत्थर मैं |
धाम तुम्हारे बने हज़ारो, पुर्शदानी हमें उबारो ||

शंकेश्वर हो या नागेश्वर, नाकोडा या शिखर गिरिवर |
तेरे चमत्कार घर-घर मैं, महिमा व्यापी नगर नगर मैं ||

मुक्त हुए सम्मेत शिखर से, रक्षक जहा भोमिय सरसे |
पहले उनको शीष नामाओ, अपनी यात्रा सफल बनाओ ||

नाकोडा के भैरव देवा, तुम भक्तो को देते मेवा |
झं-झं-झं झंकार कर रहे, सबकी नैया पार कर रहे ||

नाम तुमारा जिसने धारा, उससे सुभट केसरी हारा |
सुमिरन करे नाम जो तेरा,मेट जाए पापो का फेरा ||

दूर देश क्यों दौड़े तपते, बिगड़े काम बने जो जपते|
कलियुग भी सतयुग बन जाए, जो तेरी कृपा हो जाए ||

भक्तो को भगवान् बनाते, सेवक को श्रीमान बनाते |
लोहे को कंचन कर डाले, ऐसे पारस परम निराले ||

नमस्कार है चमत्कार को, हरो हमारे अन्धकार को |
हम घर मंगल, हम घर मंगल,बन जाए हम निर्मल-निशल ||

सजे होठ पर सबके खुशिया, रहेना जग मैं कोई दुखिया |
गाये सब जन गीत प्यार का, दर्शन होवे मुक्ति द्वार का ||

पारस प्रभु चरनन चित लाये, जो पारस इकतीस गाये |
उसकी हर मंशा हो पूरी प्रभु से रहे न उसकी दुरी ||

पास प्रभु के द्वार पर, खड़ा झुकाकर शीश |
हरो पीर मन की प्रभु, दो मंगल आशीष ||

जैसा हु वैसा प्रभु, हु तेरा ही दास |
चन्द्र चरण की शरण मैं, एक तुम्हारी आस ||

मैं अनाथ पर नाथ तू, रखना मुझ पर हाथ |
स्वीकारो मुझ पतित को, प्रभु पारसनाथ ||